ऑपरेशन ‘रैम प्रहार’ का महाशक्ति प्रदर्शन:
झिलमिल झील के पास गंगा किनारे 15 हजार सैनिकों ने तीनों मोर्चों पर दिखाया लोहा
रिपोर्ट — अरुण कश्यप
हरिद्वार। श्यामपुर क्षेत्र की झिलमिल झील के निकट गंगा किनारा रविवार को रणभूमि में तब्दील हो गया। चारों दिशाओं में गर्जन, युद्धक टैंकों की दहाड़, हेलीकॉप्टरों की आवाज़ और सैनिकों के दमदार कदमों की गूंज ने पूरे इलाके को युद्धमय बना दिया। एक माह से चल रहे ऑपरेशन रैम प्रहार के प्रशिक्षण का अंतिम और सबसे बड़ा प्रदर्शन वेस्टर्न कमांड की देखरेख में यहां सफलता पूर्वक संपन्न हुआ।
वेस्टर्न कमांड के लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कटिहार ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए बताया कि यह अभ्यास पूरी तरह वास्तविक युद्ध की परिस्थितियों को सामने रखकर डिजाइन किया गया था। इसमें 15 हजार से अधिक सैनिक, वायुसेना और थलसेना की विभिन्न यूनिटों ने हिस्सा लिया। लेफ्टिनेंट जनरल कटिहार ने दो टूक कहा—
“यदि दुश्मन ने फिर कोई गुस्ताखी की, तो इस बार जवाब कई गुना बड़ा, सटीक और निर्णायक होगा। नेतृत्व के निर्देश स्पष्ट हैं—भारत अब किसी भी मोर्चे पर पीछे हटने वाला नहीं।”
अत्याधुनिक तकनीक और कठोर प्रशिक्षण—रैम प्रहार का मूल आधार
सेना ने राजौरी से लेकर राजस्थान सीमांत तक की युद्ध परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए झिलमिल झील क्षेत्र को चुनकर जल, स्थल और हवाई तीनों मोर्चों पर व्यापक अभ्यास किया। पाकिस्तान सीमा पर सतलुज और चिनाब जैसी नदियाँ युद्ध के दौरान बड़ी बाधा बन सकती हैं। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए सैनिकों को नदियों पर मिनटों में अस्थायी पुल बनाने, भारी युद्धक वाहनों को पार कराने और उभयचर आक्रमणों की विशेष ट्रेनिंग दी गई।
विस्फरण प्रहार तकनीक द्वारा काल्पनिक दुश्मन की चौकियों को ध्वस्त करने के अभ्यास ने सभी का ध्यान आकर्षित किया। अत्याधुनिक ड्रोन, रात्रि-दृष्टि उपकरण, डिजिटल सर्विलांस फील्ड-ए तकनीक और स्वदेशी संचार प्रणालियों ने सेना की क्षमता को कई गुना बढ़ा दिया है। 80 प्लाटून को दिए गए विशेष सर्विलांस ड्रोन ने रियल-टाइम युद्ध स्थिति का अनुकरण कर युद्धक्षेत्र में गति और सटीकता की नई मिसाल पेश की।
आसमान से मौत का वार—अपाचे और चीता की दहाड़
युद्धाभ्यास के दौरान अपाचे और चीता हेलीकॉप्टरों की आकाशीय उड़ान ने पूरे क्षेत्र को दहला दिया। हेलीकॉप्टरों द्वारा की गई सटीक मिसाइल प्रहार क्षमता, त्वरित सैनिक रिहाई प्रणाली और हवाई टोही ने यह दिखा दिया कि भारतीय सेना किसी भी मौसम और किसी भी भूभाग में युद्ध लड़ने में सक्षम है।
भविष्य का युद्ध—जमीन का ही नहीं, साइबर और सूचना का भी
लेफ्टिनेंट जनरल कटिहार ने कहा कि आने वाली लड़ाइयाँ सिर्फ सीमा पर नहीं बल्कि साइबर स्पेस और सूचना क्षेत्र में भी लड़ी जाएंगी। इसलिए सैनिकों को साइबर-वारफेयर, इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग, सिग्नल इंटरसेप्शन और डिजिटल स्ट्राइक सिस्टम का विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
भारत—अब पूर्णतः आत्मनिर्भर युद्ध तकनीक में
सेना के सभी ड्रोन, सर्विलांस उपकरण और तकनीकी प्लेटफॉर्म स्वदेशी तकनीक से निर्मित हैं, जो भविष्य के किसी भी संघर्ष में निर्णायक बढ़त देंगे।
झिलमिल झील से उठी यह गूंज स्पष्ट है—
भारत तैयार है। हर मोर्चे पर। हर परिस्थिति में। और हर चुनौती का जवाब दुगुनी शक्ति और रणनीति के साथ देने को तत्पर है।



