Haridwar:अस्पतालों में मरीजों की जेब पर डाका या स्वास्थ्य सेवाओं का कारोबार? सरकारी दावों की खुली पोल!
पड़ताल: निजी अस्पतालों की फीस, जांच शुल्क और मरीजों की शिकायतों ने खड़े किए गंभीर सवाल, स्वास्थ्य सेवाओं की पारदर्शिता पर उठी बहस।
रिपोर्ट:मोहित प्रधान!
———————————–हरिद्वार। बेहतर और सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं के सरकारी दावों के बीच निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। गंभीर बीमारी और आपातकालीन परिस्थितियों में अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों और उनके परिजनों को इलाज के साथ-साथ भारी-भरकम बिलों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या स्वास्थ्य सेवाएं अब सेवा के बजाय कारोबार का रूप लेती जा रही हैं?
निजी अस्पतालों में डॉक्टर की परामर्श फीस, विभिन्न जांचों के शुल्क, बेड चार्ज, ऑपरेशन और दवाइयों के नाम पर लिए जाने वाले खर्च को लेकर मरीजों की शिकायतें सामने आती रही हैं। कई मरीजों का आरोप है कि उन्हें इलाज शुरू होने से पहले संभावित खर्च की स्पष्ट जानकारी नहीं दी जाती। वहीं, कुछ मामलों में जांच और उपचार की आवश्यकता को लेकर भी परिजन सवाल उठाते हैं।सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य विभाग निजी अस्पतालों की फीस और जांच शुल्क की नियमित निगरानी कर रहा है? क्या अस्पतालों में निर्धारित दरों की सूची सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की जाती है? मरीजों को उनके इलाज और खर्च का पूरा विवरण उपलब्ध कराया जाता है या नहीं?
हालांकि, सभी निजी अस्पतालों को एक ही नजर से देखना उचित नहीं होगा, लेकिन मरीजों की शिकायतों की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
स्वास्थ्य विभाग, जिला प्रशासन और संबंधित नियामक संस्थाओं को अस्पतालों के बिलिंग सिस्टम, जांच शुल्क, उपचार की पारदर्शिता और मरीजों के अधिकारों की जांच करनी चाहिए। आखिर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को राहत मिलेगी या इलाज का आर्थिक बोझ उनकी परेशानी और बढ़ाता रहेगा?


