राष्ट्रीय प्रेस दिवस: ग्रामीण से लेकर शहरी पत्रकारों की पीड़ा,
और दम तोड़ती पत्रकारिता,,,,
रिपोर्ट:अरुण कश्यप
देहरादून। बिना वेतन और सम्मान के पत्रकारिता दम तोड़ रही है। संपादकों के नखरों और प्रबंधन के दबाव ने हालात इतने बिगाड़ दिए हैं कि हाल ही में रुद्रप्रयाग में एक बड़े समाचार पत्र के जिला प्रभारी सहित कई ब्लॉक और तहसील प्रतिनिधियों ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया। ग्रामीण पत्रकारों से खबर जुटाने, डेली कंपेरेजेशन, अप्रेजल, कार्यक्रम कवरेज और विज्ञापन टारगेट तक पूरा कराया जाता है, जबकि मानदेय मनरेगा की चार दिन की मजदूरी जितना भी नहीं मिलता है। देहरादून जैसे महंगे शहर में यह वेतन सिर्फ कुछ दिनों की सब्जी तक सीमित है।
बड़े दैनिक अखबार को प्रतिवर्ष करोड़ों के विज्ञापन मिलते हैं, फिर भी ग्रामीण और शहरी पत्रकारों का वेतन बढ़ाना प्रबंधन को नागवार लगता है। कोरोना काल में कई पत्रकारों का वेतन घटाकर ठेके पर कर दिया गया। संपादकों के नखरे प्रेमिका जैसे बताए जाते हैं पर वेतन बढ़ोतरी पर खामोशी छा जाती है।
पहाड़ों में हालात और कठिन हैं। उत्तरकाशी में डीडी न्यूज संवाददाता दिग्बीर बिष्ट हादसे का शिकार हुए—क्योंकि पत्रकारों को खतरनाक सड़कों, लंबी पदयात्राओं और जोखिम भरी कवरेज का कोई भुगतान नहीं मिलता। बीमारी में वेतन कट जाता है और आदेश रहता है—“हमें सिर्फ खबर चाहिए।”
ऐसे माहौल में पत्रकारों का सामूहिक इस्तीफा यही कहता है
“ये ले अपनी लकुटि-कमरिया, बहुतै नाच नचायो!”
ये तो था दैनिक अखबारों के पत्रकारों का हाल जिनका कम से कम सम्मान तो कायम है और कुछ ना कुछ मानदेय भी मिल ही जाता है किंतु सोशल मीडिया की सुनामी में बहकर आए हजारों डिजिटल पत्रकारों का तो बस खुद का खर्च भी कैसे निकलता होगा ये अपने आप में घोर आश्चर्य है, कई ने अपने अपने फेसबुक पेज के नाम से ही सेटेलाइट न्यूज़ चैनल की तरह माइक और id बनवा ली है और सुबह से शाम तक बस पता नहीं किस दौड़ में दौड़ते रहते हैं आश्चर्य की बात है कि इन बेवजह की भागदौड़ करने वाले लोगों की संख्या भी दिन ब दिन बढ़ती जा रही है,
अब एक अपवाद और भी है कि सेटेलाइट न्यूज़ चैनल और दैनिक अखबारों के पत्रकारों के बारे में ये कहा जाता है कि वो इन पोर्टल और फेसबुक वालों को पत्रकार ही नहीं मानते।



