मिस्टर ‘कानूनगो’ पर सिस्टम क्यों मेहरबान? 420 समेत दो मुकदमे, चार्जशीट दाखिल… फिर भी हरिद्वार में तैनाती पर सवाल
रिपोर्ट: दिशा शर्मा| हरिद्वार
हरिद्वार।आज आपको एक ऐसे बड़ी शख्सियत के बारे में रुबरु कराते हैं जिनका कद भले ही छोटा हो पर कारनामे बहुत बड़े हैं, कारनामे भी इतने बड़े कि पूरा सिस्टम नियम विरुद्ध काम करने को विवश हो गया,
हम बात कर रहे हैं एक ऐसे मिस्टर कानूनगो की जिसके खिलाफ कुछ दिन पहले एक बड़े दल ने सारी कलई खोलते हुए जांच की मांग भी की थी,
किंतु बड़ी पहुंच रखने वाला ये पटवारी से कानूनगो बना ये शख्स सबको अपनी जेब में रखने की बात भी करता है,
हरिद्वार जिले में तैनात इस “मिस्टर कानूनगो” को देखकर सरकार के जीरो टॉलरेंस वाले दावे भी सवालों के घेरे में नजर आते है। गंभीर आपराधिक मामलों, दस्तावेजों में छेड़छाड़, जालसाजी और विवादों के बावजूद भी संबंधित कानूनगो रमेश चंद पर सिस्टम की मेहरबानी आखिर क्यों बरकरार है — यही सवाल अब प्रशासनिक गलियारों से लेकर आमजन तक में गूंज रहा है।
मौजूदा समय में तहसील लकसर में तैनात कानूनगो रमेश के खिलाफ धारा 420, 467, 468, 471 आईपीसी के तहत मुकदमे दर्ज बताए जा रहे हैं। आरोप है कि उन्होंने किसी अन्य व्यक्ति की जमीन दर्शाकर करीब 95 लाख रुपये की ठगी की। यह कोई साधारण मामला नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड और राजस्व व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा प्रहार माना जा रहा है। सूत्रों की मानें तो इस प्रकरण में चार्जशीट भी न्यायालय में दाखिल हो चुकी है और मामला विचाराधीन है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस जनपद में मुकदमे चल रहे हों, वहीं दोबारा तैनाती कैसे मिल जाती है? जब मुकदमा कोर्ट में दाखिल होने का वक़्त आया तो जनाब भी जिला नैनीताल से वापस जिला हरिद्वार आ गए, आखिर ऐसा कौन-सा अदृश्य संरक्षण है, जिसके दम पर यह “मिस्टर कानूनगो” लगातार मनचाही पोस्टिंग हासिल कर लेते हैं? चर्चा तो यहां तक है कि वह अपने खिलाफ चल रही जांचों को प्रभावित करने के लिए भी सिस्टम पर पकड़ बनाए रखते हैं। नैनीताल से हरिद्वार तक की तैनाती को लेकर भी प्रशासनिक हलकों में कानाफूसी तेज है।
मामला यहीं खत्म नहीं होता। प्रदेश को हिलाकर रख देने वाले बहुचर्चित नगर निगम भूमि घोटाले में भी शक की सुई इसी कानूनगो की ओर घूमती रही। बताया जा रहा है कि धारा 143 की कार्रवाई में जिस असामान्य तेजी से रिपोर्ट लगाई गई, उसने कई सवाल खड़े किए। और तो और जिस लेखपाल की पारिवारिक ज़मीन नगर निगम ने खरीदी है, वो लेखपाल भी इनका खास है। लेकिन हैरानी यह है कि जांच की दिशा में यह कोण जैसे जानबूझकर धुंधला कर दिया गया।
हाल ही में लक्सर में एक अधिवक्ता के साथ मारपीट और अभद्रता के मामले में भी इसी कानूनगो के खिलाफ bns की धारा 115, 351 और 352 के तहत मुकदमा दर्ज हुआ है। यानी आरोपों की फेहरिस्त लंबी है, लेकिन कार्रवाई अब भी नदारद। जो निजी पीड़ित हैं, चाहे वो जालसाजी वाले प्रकरण में हो या इस मारपीट में उन्होंने तो न्याय के लिए मुक़दमे कर दिए। सवाल उठते हैं कि सरकार क्या कर रही है?? क्या फर्जीवाड़ा कोई रोजमर्रा की बात है? या नगर निगम के भूमि घोटाले रोजमर्रा की बात है? या वकीलों से मारपीट रोजमर्रा की बात है? सजग प्रशासन के लिए तो एक ही सवाल काफी था, यहां तो सवाल पर सवाल हैं।
अब बड़ा सवाल यही है — जीरो टॉलरेंस की सरकार के कानों तक क्या यह मामला नहीं गया,
या फिर “मिस्टर कानूनगो” सचमुच किसी ऐसे अदृश्य आशीर्वाद से लैस हैं?



