मिलिए हरिद्वार के’मिस्टर खास’ कानूनगो से,
इनके आगे कायदे कानून भी हो जाते हैं नतमस्तम।

रिपोर्ट :अरुण कश्यप
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कहते हैं कानून की नजर में सब बराबर हैं। लेकिन हमारे जिले के ‘मिस्टर खास’ कानूनगो साहब ने इस कहावत को ही बदल दिया है। लगता है हमारे जिले के कानूनगो साहब ने कानून की आँखों पर ही पट्टी बाँध दी है। एक आम सरकारी कर्मचारी के लिए मुकदमा हो जाए तो रातों की नींद उड़ जाती है। जाँच बैठ जाए तो पसीना छूट जाता है। लेकिन ‘मिस्टर खास’ कानूनगो साहब के लिए? साहब के लिए तो ये सब ‘आम’ बात है। आखिर हो भी क्यों न, साहब ‘खास’ जो ठहरे !
आइए आपको रूबरू कराते हैं ‘मिस्टर खास’ की उन ‘खासियत’ से, जो शायद बड़े-बड़े अधिकारियों को भी नसीब नहीं होतींः
खासियत नंबर 1 गिरफ्तारी ? वो भी साहब की?… नहीं जी, नहीं !
धारा 420 467 468 471 का संगीन मुकदमा। दो आरोपी। पुलिस ने एक को धर-दबोचा, सीधे सलाखों के पीछे। अब बारी थी साहब की। और तभी चमत्कार हुआ।
साहब को अचानक ‘चिकित्सा लाभ का दैवीय वरदान’ प्राप्त हो गया। बीमारी आई, मेडिकल लीव आई, और साथ में आया हाई कोर्ट से स्टे लेने का बेशकीमती वक्त। साहब बीमार क्या हुए, मानों कानून के हाथ ही छोटे पड़ गए। इसी ‘मेडिकल लीव’ के खेल ने उन्हें हाई कोर्ट से ‘स्टे’ लाने का बेशकीमती वक्त तोहफे में दे दिया।
भगवान सबको देता है पर ऐसी ‘टाइम्ड बीमारी’ सिर्फ खास लोगों को आती है
खासियत नंबर 2: मुकदमों और जांचों के दाग और प्रमोशन का ताज !
धारा 420 467 468 471 मुकदमा भी चला। चार्जशीट भी आई।और प्रमोशन भी हो गया। बिना रुके, बिना झिझके, बिना किसी को कुछ बताए ।
अब यह प्रमोशन किन नियमों के तहत, किसकी अनुमति से और किसकी आँखें मूंदकर हुआ यह सवाल विभाग से पूछा जाना चाहिए
क्योंकि आम कर्मचारी के लिए तो चार्जशीट ही काफी होती है करियर रोकने के लिए।
लेकिन ‘मिस्टर खास’ के लिए? चार्जशीट शायद ‘सीवी में उपलब्धि’ की तरह दर्ज होती है।
खासियत नंबर 3: ‘वीवीआईपी’ ट्रेनिंगः सिर्फ साहब के लिए पूरा
ताम-झाम आपने सुना होगा कि ट्रेनिंग बैच में होती है, लेकिन साहब इतने खास हैं कि उनके लिए अकेले ट्रेनिंग का इंतजाम किया गया। मानों पूरा विभाग उनके आगे-पीछे घूमने के लिए ही बना हो। क्या किसी और कर्मचारी को ऐसी ‘अकेली’ ट्रेनिंग नसीब हुई है ? किसी और कर्मचारी को ऐसा सौभाग्य मिला है? जवाब आप खुद सोचिए।
और तो और ट्रेनिंग में गए पूरे बैच का रिजल्ट भी रुका रहा और इन खास कानूनगो साहब की अकेले की ट्रेनिंग के बाद एक साथ ही आया। लगता है खास लोगो के लिए इतना तो किया ही जा सकता है ।
खासियत नंबर 4 जिला प्रशासन की ‘मासूमियत’ या साहब की पकड़ ? शिकायत हुई। ADM साहब की जाँच बैठी।और जून 2022 का मुकदमा और फरवरी 2023 की जांच में जिला प्रशासन का तर्क सुनिए, जरा ध्यान से सुनिए (जल्दबाजी मत करियेगा, खास कानूनगो की खास ताकत दिखती है यहाँ): “कार्यालय में उनके विरुद्ध उक्त रिपोर्ट से सम्बंधित सूचना प्राप्त नहीं है और न ही सम्बंधित थाना या अन्य किसी विभाग द्वारा सूचना उपलब्ध कराई गई
2022 का मुकदमा। जिले भर में चर्चा। और जिला प्रशासन को खबर नहीं। वाह रे सिस्टम
खासियत नंबर 5: दोषी पाए गए पर ‘फाइल की जलेबी’ ने बचा लिया
2024 में नगर निगम भूमि खरीद कांड पहले सचिव साहब की जांच में तो जैसे तैसे बच निकले पर 2025 की ADM साहब की जांच में दोषी पाए गए
अब ADM साहब शायद ‘मैनेज’ नहीं हुए। तो क्या हुआ?
साहब ने वो हथियार निकाला जो निकम्मे सरकारी कर्मचारयों पर हमेशा होता है, फाइल की जलेबी बनवाने का,खास कानूनगो ने अपने खास मित्रों और शुभचिंतकों की मदद से फाइल राजस्व परिषद पहुंचा दी। राजस्व परिषद ने भी आश्चर्य व्यक्त करा, भाई प्रकरण जिले का है। यहाँ क्यों भेज रहे हो? कार्यवाही करो इस दोषी कानूनगो पर और अवगत कराओ। अब फाइल फिर कार्यवाही का इंतजार कर रही है। राजस्व परिषद जो कि राजस्व विभाग की राजस्व की सर्वोच्च संस्था है। लेकिन कार्यवाही में जो टाल-मटोल हो रही है, उसे देखकर लगता है शायद परिषद भी साहब के आगे ‘छोटी’ पड़ गई।
खासियत नंबर 6: DM साहब ‘आम’, कानूनगो ‘खास’!
और ये देखिये असली खास बात। प्रारंभिक जाँच में महज ‘शक’ होने पर सिर्फ शक पर जिले के DM साहब सस्पेंड हो गए।
लेकिन ‘मिस्टर खास’ कानूनगो ? उन पर संगीन मुकदमे हैं। चार्जशीट है। ADM साहब की जाँच में दोषी पाए जा चुके हैं। राजस्व की सर्वोच्च संस्था कार्यवाही के लिए कह रही है। फिर भी वो उसी जिले में तैनात हैं। शान से। मजे से।
और सिस्टम ? सिस्टम शायद उन्हें पाल रहा है।
बताते चलें, डीएम साहब एक आईएएस अधिकारी हैं जिनके नियुक्ति अधिकारी देश के महामहिम राष्ट्रपति होते हैं और कानूनगो के नियुक्ति अधिकारी डीएम साहब होते हैं ।
जो रिश्ता डीएम साहब का महामहिम राष्ट्रपति से से है, वो रिश्ता कानूनगो का डीएम साहब से है।
समझ रहे हो आप ? जरा सोच के देखो, किसी प्रकरण में महामहिम राष्ट्रपति पर कार्यवाही हो जाए और डीएम साहब बचे रहे? लगा न सुनने में बहुत अजीब ।
ऐसे ही थोड़े न कह रहे हैं इन्हे खास कानूनगो ।
क्या इन्हे महामहिम कानूनगो की संज्ञा दी जा सकती है? अपने विचार बताइयेगा ।
खासियत नंबर 7: नैनीताल के ‘आम’ कानूनगो बनाम हरिद्वार के
‘खास’ कानूनगो
अब एक तुलना जो तर्कहीन सिस्टम की एक ओर तस्वीर दिखाती है।
जिला नैनीताल के 2 कानूनगो ने निजी व्यक्तियों की मदद से काम किया। काम वैध था।
लेकिन प्रक्रिया में कहीं चूक हुई और वो डिमोट हो गए। बहुत अच्छा हुआ ।
अब हरिद्वार के ‘मिस्टर खास’ को देखिए
धारा 420 467 468 471 में धोखाधड़ी और जालसाजी की हरकत ?
हम नहीं पुलिस कह रही है। फारेंसिक जाँच करके कह रही है।
नगर निगम कांड में भूमिका
हम नहीं,राजस्व परिषद कह रही है।
वकीलों से मारपीट ?
हम नहीं, लक्सर में दर्ज मुकदमा बता रहा है।
वी वी आई पी ट्रेनिंग
और इन सबके बावजूद डिमोशन तो दूर, साहब पर कोई आँच तक नहीं।
और अंत में साहब का ‘संदेश’ सुनने में आता है कि साहब कहते हैं “सब बिकते हैं, खरीदने वाला चाहिए” पता नहीं भाई कितना सच है कितना झूठ, पर बंदा खास है ये
तो तय है।
साहब का आत्मविश्वास देखिए। शायद साहब को पता है कि उनके ‘अदृश्य संरक्षक’ कितने मजबूत हैं। शायद उनके पास किसी की ऐसी फाइल है जिसे देखकर प्रशासन चुप हो जाता है।
शायद ये सब पढ़ने के बाद, सूबे के मुखिया इस खास कानूनगो को गर्मी का सीजन आने से पहले ‘आम’ बना दें। उम्मीद करते हैं।



